‘मन के आँगन में शब्दों के पारिजात’

सुबह-सुबह बच्चे को स्कूल छोड़ने जाते वक्त श्रीमती जी ने पीछे से आवाज दी ‘लौटते हुए पूजा के लिए फूल तोड़ लाना आज से नवरात्र प्रारम्भ हो रहे हैं।’ फूल तोड़ने की बात सुनकर में थोड़ा अनमना सा हो गया। फूलों की बगिया सजाना मुझे हमेशा से प्रिय रहा है। किंतु जब भी किसी को फूल तोड़ते देखता हूँ तो मन खिन्न हो जाता है। कितना परिश्रम करता है एक पेड़ अपनी शाखों पर फूल खिलाने के लिए। शायद अपनी समूची प्राण शक्ति झोंक देता होगा तब फूल के रूप में इस अनुपम सौंदर्य को रच पाता होगा। और हम बस एक झटके में उस फूल को तोड़कर अपनी झोली में डाल लेते हैं। सुबह की सैर में पूजा के नाम पर फूल के पेड़ों को नोचते झकझोरते लोग पता नहीं कैसे इस अपराध बोध से मुक्त हो पूजन कर पाते होंगे। यही सब सोचते स्कूल से लौट रहा था और रास्ते मे लगे फूल तोड़ना तो दूर छूने में भी मुझे संकोच हो रहा था। सोचा किसी दुकान से ले आऊँगा फूल। नवरात्र के पहले ही दिन मुझसे न होगी यह हिंसा। तभी किसी के आँगन से आ रही एक मनमोहक सुगंध से में ठिठक गया। सुगंध जानी पहचानी थी पर वह आ कहाँ से रही थी यह प्रश्न था। जब चारों तरफ नजर घुमाई तो देखा पड़ोसी के आँगन में लगे पारिजात की एक डाल परकोटे से बाहर आ गई थी। ना जाने क्यों कभी इस पेड़ पर मेरी नजर नहीं पड़ी। सड़क किनारे बने एक चबूतरे पर यह डाल फूलों की वर्षा कर रही थी। हवा के झोंके से जितने पारिजात
के सफेद-केसरिया फूल चबूतरे पर झर रहे थे उससे कहीं ज्यादा उनकी सुगंध हवा मेंझर रही थी। सहसा मेरे सम्मोहित से कदम चबूतरे की ओर बढ़ गए और सुगंध से मंत्रमुग्ध सा मैं वहीं बैठ गया। मुझे याद आने लगा पौराणिक कथाओं में वर्णित समुद्र मंथन का वह आलोडन-विलोडन जिसकी लहरें शिव के माथे पर सजे नवजात चंद्रमा को छू रहीं थी। समय था समुद्र मंथन से ग्यारहवें रत्न के उदय का। यह ग्यारहवाँ रत्न पारिजात के रूप में देव और असुरों में मध्य प्रगट हुआ। पारिजात के पुष्पों की मोहक सुगंध से देवासुर मुग्ध हो गए और इसे प्राप्त करने हेतु प्रयास करने लगे। अंततः यह देवराज इंद्र के हिस्से में आया और इसे स्वर्ग के उद्यान में रोपित किया गया । लेकिन यह कौन जानता था कि समुद्र से निकला यह रत्न न तो देवताओं के स्वर्गलोक के लिए है और न ही असुरों के पाताल लोक के लिए। इसकी नियति तो पृथ्वीलोक पर अपनी सुगंध बिखेरना है। पारिजात को पृथ्वीलोक पर लाने का कारण बने देवर्षि नारद जिन्होंने एक बार श्री कृष्ण की भार्या सत्यभामा को इस फूल की सुगंध से अवगत कराया। परिजात की सुगंध और सौंदर्य से सम्मोहित सत्यभामा ने श्रीकृष्ण से इसे पृथ्वी पर लाने का आग्रह किया। श्रीकृष्ण ने इंद्र से जब पारिजात माँगा तो इंद्र ने इंकार कर दिया। जिसके चलते दोनों के बीच एक युद्ध हुआ जिसमें विजय प्राप्त कर श्रीकृष्ण पारिजात को लेकर पृथ्वी पर आ गए। श्रीकृष्ण की एक अन्य पत्नि रुक्मणी को भी पारिजात से स्नेह था। इसलिए श्रीकृष्ण ने इसे रुक्मणी के आँगन में इस तरह लगाया कि इसके फूल सत्यभामा के आँगन में भी झरते रहे। योगिराज कृष्ण यह जानते थे कि पेड़ के पालन पोषण से किसे आनंद मिलेगा और फूलों के सौंदर्य से किसे। इस प्रकार यह पुष्प पृथ्वी पर आया। कथाएँ यह भी कहती हैं कि नरकासुर नामक दैत्य का वध एक युद्ध में इंद्र की रक्षा हेतु श्रीकृष्ण और सत्यभामा ने मिलकर किया था। लेकिन कृतघ्न इंद्र ने युद्ध के पश्चात किसी भी प्रकार की कृतज्ञता श्रीकृष्ण के प्रति ज्ञापित नहीं की। इस उपेक्षा से क्रुद्ध होकर सत्यभामा ने श्रीकृष्ण को स्वर्ग से पारिजात का पेड़ लाने का आग्रह किया। इंद्र पारिजात श्रीकृष्ण को देना नहीं चाहता था इसलिए दोनों में युद्ध हुआ और श्रीकृष्ण ने युद्ध जीतकर पारिजात प्राप्त किया। इंद्र इस हार से क्रुद्ध हो गया और उसने शाप दिया कि पारिजात के फूल रात में ही खिलेंगे और सूर्य की पहली किरण पड़ते ही इसके फूल पृथ्वी पर गिर जाएंगे। इस प्रकार इसके जमीन पर गिरे हुए फूल ही देवताओं को अर्पण किये जा सकेंगे। इंद्र के यह वचन न जाने किसके लिए शाप बने होंगे पर मेरे लिए आज वरदान जरूर बन गये थे। जिसके चलते मुझे बिना किसी पेड़ या पौधे को कष्ट पँहुचाये पूजा के लिए अँजुली भर फूल मिल गए थे। जिन्हें मैं बिना किसी ग्लानि और अपराध भाव के अपने आराध्य को अर्पित कर सकता था। समुद्र मंथन से निकले अन्य रत्न जहाँ आम इंसान की पहुँच से दूर केवल अपने मिथकीय रूप में उपलब्ध हैं। वहीं पारिजात रूपी यह रत्न आप अपने आँगन में सजा सकते हैं। पारिजात न केवल एक रत्न है बल्कि प्रतीक है श्रेष्ठता, सहजता, सर्वसुलभता और समर्पण का। जिस तरह इसके झरते फूलों का परिमल हमारे और आपके मन को प्रसन्नता और सकारात्मकता देता है। उसी तरह मेरे इस स्तंभ से झरने वाले शब्द भी आपको ऐसा ही आनंद दे पायें ऐसी आशा है। आइये पारिजात से प्रेरणा लेकर हम इस स्तंभ को पारिजात नाम दें। आशा है आप यहाँ शब्दों के फूल चुनने आते रहेंगे।
-कुलदीप

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